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Location Madanpur,Mirzapur
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कुतुब मीनार - दिल्ली

29 Apr 2019

दिल्‍ली के अंतिम हिन्‍दू शासक की पराजय के तत्‍काल बाद 1193 में कुतुबुद्धीन ऐबक द्वारा इसे 73 मीटर ऊंची विजय मीनार के रूप में निर्मित कराया गया। इस इमारत की पांच मंजिलें हैं। प्रत्‍येक मंजिल में एक बालकनी है और इसका आधार 1.5 मी. व्‍यास का है जो धीरे-धीरे कम होते हुए शीर्ष पर 2.5 मीटर का व्‍यास रह जाता है और पहली तीन मंजिलें लाल बलुआ पत्‍थर से निर्मित है और चौथी तथा पांचवीं मंजिलें मार्बल और बलुआ पत्‍थरों से निर्मित हैं। मीनार के निकट भारत की पहली क्‍वातुल-इस्‍लाम मस्जिद है। यह 27 हिन्‍दू मंदिरों को तोड़कर इसके अवशेषों से निर्मित की गई है।"इस मस्जिद के प्रांगण में एक 7 मीटर ऊँचा लौह-स्‍तंभ है। यह कहा जाता है कि यदि आप इसके पीछे पीठ लगाकर इसे घेराबंद करते हो जो आपकी इच्‍छा होगी पूरी हो जाएगी।_______ कुतुब मीनार भारत में दक्षिण दिल्ली शहर के महरौली भाग में स्थित, ईंट से बनी विश्व की सबसे ऊँची मीनार है। इसकी ऊँचाई 72.5 मीटर (237.86 फीट) और व्यास १४.३ मीटर है, जो ऊपर जाकर शिखर पर 2.75 मीटर (9.02 फीट) हो जाता है। इसमें ३७९ सीढियाँ हैं। मीनार के चारों ओर बने अहाते में भारतीय कला के कई उत्कृष्ट नमूने हैं, जिनमें से अनेक इसके निर्माण काल सन 1192 के हैं। यह परिसर युनेस्को द्वारा विश्व धरोहर के रूप में स्वीकृत किया गया है।

कुतुब मीनार इतिहास

अफ़गानिस्तान में स्थित, जाम की मीनार से प्रेरित एवं उससे आगे निकलने की इच्छा से, दिल्ली के प्रथम मुस्लिम शासक कुतुबुद्दीन ऐबक, ने इस्लाम फैलाने की सनक के कारण वेदशाला को तोड़कर कुतुब मीनार का पुनर्निर्माण सन ११९३ में आरंभ करवाया, परंतु केवल इसका आधार ही बनवा पाया। उसके उत्तराधिकारी इल्तुतमिश ने इसमें तीन मंजिलों को बढ़ाया और सन १३६८ में फीरोजशाह तुगलक ने पाँचवीं और अंतिम मंजिल बनवाई । मीनार को लाल बलुआ पत्थर से बनाया गया है, जिस पर कुरान की आयतों की एवं फूल बेलों की महीन नक्काशी की गई है जो कि फूल बेलों को तोड़कर अरबी शब्द बनाए गए हैं कुरान की आयतें नहीं है। कुतुब मीनार पुरातन दिल्ली शहर, ढिल्लिका के प्राचीन किले लालकोट के अवशेषों पर बनी है।______ ऐबक से तुगलक काल तक की वास्‍तुकला शैली का विकास इस मीनार में स्‍पष्‍ट झलकता है। प्रयोग की गई निर्माण सामग्री और अनुरक्षण सामग्री में भी विभेद है । 238 फीट कुतुबमीनार का आधार 17 फीट और इसका शीर्ष 9 फीट का है । मीनार को शिलालेख से सजाया गया है और इसकी चार बालकनी हैं। जिसमें अलंकृत कोष्‍ठक बनाए गए हैं। कुतुब परिसर के खंड़हरों में भी कुव्‍वत-ए-इस्‍लाम (इस्‍लाम का नूर) मस्जिद विश्‍व का एक भव्‍य मस्जिद मानी जाती है। कुतुबुद्धीन-ऐबक ने 1193 में इसका निर्माण शुरू कराया और 1197 में मस्जिद पूरी हो गई।

वर्ष 1230 में अल्‍तमश ने और 1315 में अलाउद्दीन खिलजी ने इस भवन का विस्तार कराया। इस मस्जिद के आंतरिक और बाहरी प्रागंण स्‍तंभ श्रेणियों में है आंतरिक सुसज्जित लाटों के आसपास भव्‍य स्‍तम्‍भ स्‍थापित है। इसमें से अधिकतर लाट 27 हिन्‍दू मंदिरों के अवशेषों से बनाए गए हैं। मस्जिद के निर्माण हेतु इनकी लूटपाट की गई थी अतएव यह आचरण की बात नहीं है कि यह मस्जिद पारंपरिक रूप से हिन्‍दू स्थापत्‍य–अवशेषों का ही रूप है। मस्जिद के समीप दिल्‍ली का आश्चर्यचकित करने वाला पुरातन लौह-स्‍तंभ स्थित है। कुतुबमीनार का निर्माण विवादपूर्ण है कुछ मानते है कि इसे विजय की मीनार के रूप में भारत में मुस्लिम शासन की शुरूआत के रूप में देखा जाता है। कुछ मानते है कि इसका निर्माण मुअज्जिन के लिए अजान देने के लिए किया गया है। बहरहाल इस बारे में लगभग सभी एकमत है। कि यह मीनार भारत में ही नहीं बल्कि विश्‍व की बेहतरीन स्‍मारक है। दिल्‍ली के पहले मुस्लिम शासक कुतुबुद्धीन ऐबक ने 1200 ई. में इसके निर्माण कार्य शुरु कराया किन्‍तु वे केवल इसका आधार ही पूरा कर पाए थे। इनके उत्‍तराधिकारी अल्तमश ने इसकी तीन मंजिलें बनाई और 1368 में फिरोजशाह तुगलक ने पांचवीं और अंतिम मंजिल बनवाई थी।