:: Welcome To | Indian Culture ::
   
                            Welcome to AWA Culture
               
Call Us 9170800951                
           
Location Madanpur,Mirzapur
single

पारंपरिक खेलों पर मंडरा रहे संकट के बादल!

29 Apr 2019

नये दौर में न सिर्फ लोगों का रहन-सहन बदला है बल्कि लोगों के खान-पान, खेल-कूद व मनोरंजन के साधन भी बदल गये हैं. आज हर घर डिस्को, पब, फास्ट फुड, 80 जीबी का आइपड, स्मार्ट फोन, ब्रांडेड कपड़े व जूते, आंख पर महंगे चश्मे आदि शायद लोगों की पहचान बन गयी है. आज के बच्चे मैदान में नहीं बल्कि कंप्यूटर पर गेम खेलना पसंद करते हैं. बेब्लेड खेलते हैं. ______ क्रिकेट, हाकी, बास्केटबाल, वोलीबाल, सक्वाश और टेनिस आदि खेलों के सामने ऐसे लगने लगा है कि हमारे देश में कोईभी खेल नहीं खेला जाता था और खेलना कूदना हमें अंग्रेज़ों ने ही सिखाया। वास्तव में यह सभी खेल जन साधारण के नहीं हैं क्योंकि इन्हें खेलने के लिये बहुत महंगे उपकरणों की, जैसे की विस्तरित मैदान और साजो सामान की आवश्यक्ता पडती है जिन्हें जुटा पाना आम जनता के लिये तो सम्भव ही नहीं है। आजकल भारत में खेलों दूारा मनोरंजन केवल देखने मात्र तक सीमित रह गया है। प्रत्यक्ष खेलना तोकेवल उन साधन सम्पन्न लोगों के लिये ही सम्भव है जो महंगी कलबों के सदस्य बन सकें। इस की तुलना में प्राचीन भारतीय खेल खरचीले ना हो कर सर्व साधारण के लिये मनोरंजन तथा व्यायाम का माध्यम थे।______ मोक्ष प्राप्ति के लिये ‘काया-साधना’ करनी पडती है। हिन्दू मतानुसार शारीरिक क्षमता की बढौतरी करते रहना प्रत्येक प्राणी का निजि कर्तव्य है। अतः शरीर के समस्त अंगों के बारे में जानकारी होनी चाहिये। योग का अभिप्राय शारीरिक शक्ति की वृद्धि और इन्द्रीयों पर पूर्ण नियन्त्रण करना है। इस साधना की प्राकाष्ठा समाधि, ऐकाग्रता तथा शारीरिक चलन हैंजिन का विकास सभी खेलों में अत्यन्त आवश्यक है। अष्टांग योग साधना के अन्तरगत आसन (उचित प्रकार से अंगों का प्रयोग), प्राणायाम (श्वास नियन्त्रण), तथा प्रत्याहार (इन्द्रियों पर नियन्त्रण) मुख्य हैं।

बच्चे मैदान के बदले कंप्यूटर पर गेम खेलना करते हैं पसंद

उन्हें जिन खेलों में तड़क-भड़क ज्यादा दिखता है उसे ही खेलना पसंद करते हैं. आज बच्चों के पसंद में बैटबॉल, टेबल टेनिस व बैडमिंटन शामिल हैं. पर, पारंपरिक खेल खो-खो, कबड्डी, गिल्ली-डंडा आदि पसंद नहीं आते. आज लोग मिट्टी से जुड़े खेल को नापसंद कर रहे हैं. जमीन पर बैठ कर आराम से सुस्ताते हुए पारंपरिक खेल का मजा लोग नहीं लेना चाहते, बल्कि उन्हें शोर शराबे वाला स्टेडियम चाहिए. खेल के लिए भरपूर संसाधन होने चाहिए और अगर खुले मैदान का खेल है तो उसे भी वातानुकूलित में खेलना पसंद करते हैं. ऐसी मानसिकता रखनेवाले लोगों के कारण आज पारंपरिक खेलों पर संकट के बादल गहरा रहे हैं. ______ अब मैदान में कहां दिखते खो-खो व कबड्डी के खिलाड़ी : खो-खो व कबड्डी एक भारतीय खेल है. लट्टू व गिल्ली-डंडा भी यहीं का खेल रहा है. इन खेलों में किसी विशेष साधन की आवश्यकता नहीं होती. इन खेलों में माना जाता है कि युवाओं को संघर्षशीलता व जोश भरने वाला ये खेल है. ये खेल एक अनूठा स्वेदेशी खेल है. जिससे अत्यधिक तंदुरूस्ती, कौशल, गति, ऊर्जा और प्रतिस्पर्द्धा की उन्नति होती है. ______ आज के आधुनिक खेलों की अपेक्षा इन खेलों में खर्च भी न के बराबर होता है और अन्य खेलों की अपेक्षा इसे अच्छा माना जाता है, लेकिन आज ये खेल न तो किसी भी स्कूल के खेल-कूद का महत्वपूर्ण हिस्सा है और न ही आम तौर पर किसी मैदान में लोग खेलते दिखते हैं. पहले तो सरकारी व गैर सरकारी स्कूलों में शारीरिक शिक्षक इन खेलों का नियमित आयोजन करते थे और बच्चे बड़े उत्साह से इस खेल को खेला करते थे. बड़े आयोजनों में बड़े लोग भी इस खेल का हिस्सा बना करते थे, लेकिन अब ऐसा कहां.

______संघ की शाखा में अब भी जीवित______ स्वदेशी खेल होने के नाते खो-खो व कबड्डी को आरएसएस ने अब तक जीवित रखा है. आज भी संघ की जहां-जहां नियमित शाखा लगती है वहां इन खेलों को बखूबी खेला जाता है. शारीरिक व्यायाम व इन खेलों को शाखा में आनेवाले बड़े व छोटे सभी उम्र के स्वयंसेवक मजे से खेलते हैं. शहर के एक शाखा के वरीय स्वयंसेवक रंजय अग्रहरी बताते हैं कि खो-खो व कबड्डी एक पारंपरिक खेल है, जिसमें खिलाड़ियों का सिर्फ श्रम लगता है. ______ और ये खिलाड़ियों में स्फूर्ति पैदा करता है. मैदान में खेले जाने वाले खेलों में इसकी एक अलग पहचान है. इसे पुरुष व महिला दोनों खेलते हैं. आज लोग भले ही इन खेलों से कट रहे हैं पर किसी समय में खो-खो व कबड्डी लोकप्रिय खेल रहा करता था, हालांकि कबड्डी जैसे खेल को अब ऐशियाई खेलों में शामिल कर लिया गया है. इसे बढ़ावा देने के लिए 2004 में पहला विश्वकप भी आयोजित किया गया. अब तक के विश्व कप में भारत सभी में विजेता भी रहा है. वैसे टीवी पर भी प्रो कबड्डी का आगाज हुआ है, जिसे लोकप्रिय बनाने का प्रयास किया रहा है.